रविवार, 6 दिसंबर 2009

एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश!

क्या राजनीति की बिसात पर किसी ऐतिहासिक स्थल की कुर्बानी देनी सही है? नहीं, लेकिन बाबरी विध्वंस की घटना भारतीय राजनीति का वह काला अध्याय है, जिसमें संकीर्ण मानसिकता की वेदी पर एक ऐतिहासिक इमारत की आहूति दे दी गई। महज भगवान श्रीराम का जन्मस्थल होने की वजह से बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया था। लेकिन उसे तोडऩे वाले लोग ही मर्यादा पुरुषोत्तम की नीति को भूल गए। श्रीराम के राज्य में सभी धर्मों के लोग एक साथ रहा करते थे और उनमें राग या द्वेष की कोई भावना नहीं थी, लेकिन विडंबना रही कि उनके पदचिन्हों का अनुसरण करने का दावा करने वाले उनके कथित भक्त ही धर्मों के आधार पर एक-दूसरे से झगडऩे लगे। आज तो न सिर्फ राम मंदिर के नाम पर राजनीतिक रोटी सेंकी जा रही है, बल्कि लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट के आधार पर राजनीतिक दल एक-दूसरे आरोप-प्रत्यारोप भी कर रहे हैं, लेकिन इस राजनीतिक घपलेबाजी में कोई भी सच्चा हिंदुस्तानी शायद ही इस बात से इंकार करेगा कि एक ऐतिहासिक इमारत को महज राजनीतिक कैरियर चमकाने के लिए विवादित बना दी गई है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि सहअस्तित्व ही भारतीयों की बुनियाद रही है और क्षुद्र राजनीति के लिए इस बुनियाद की नींव कमजोर नहीं की जा सकती। वैसे भी, अगर भविष्य में वहां राम मंदिर बन भी गया, तो भी क्या बाबरी मस्जिद के अस्तित्व को भुलाना आसान होगा?

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

मोहल्ला लाइव का सवाल और मेरा विचार : हम कब बोलेंगे ?

poll mohalla live

कोई हमारी गलतियां गिनाये और यथार्थ का आईना दिखाये, तो क्या हम उद्वेलित नहीं होते ? जब पड़ोसी हमसे कहता है कि मेरे घर का कचरा उसके मकान के सामने फैंका गया है, तो सही होने पर भी क्या हम उसे स्वीकारते हैं, उससे नहीं झगड़ते? जब कोई हम पर झूठा होने का तोहमत लगाता है, तो क्या हम उससे दो-दो हाथ करने को तैयार नहीं होते? तो, फिर आज हम क्यों खामोश हैं।

मोहल्ला लाइव का कल का प्रश्न हमारी खामोशी को टटोल रहा है। हमें तनिक भी बैचेनी नहीं हुई कि कोई हमें यह बता रहा है कि भोपाल गैस कांड के 25 वर्ष बीतने पर भी हम खामोश हैं। आखिर क्यों? सचाई का आईना देखने के बाद भी क्यों हमें ग़ुस्सा नहीं आया। शायद इसलिए, क्योंकि हम इससे जुड़े हुए नहीं हैं या फिर चुप रहने की हमारी आदत हो गयी है।

अमूमन ऐसा माना जाता है कि समाज में मूलत: दो तरह के लोग ही होते हैं। एक वे, जो जुल्म का विरोध करते हैं और दूसरे वे, जिन्हें दमन को चुपचाप सहना ज़्यादा मुफीद लगता है। लेकिन हाल के वर्षों में एक ऐसा वर्ग भी उभरा है, जो तब तक उद्वेलित नहीं होता, जब तक उसका अपना क़रीबी किसी हादसे का शिकार नहीं होता। यही कारण है कि यूनियन कार्बाइड की चपेट में आकर असमय मौत का शिकार बने सैकड़ों निदोर्षों की मौत की 25वीं बरसी पर भी हमें शांत रहना ज़्यादा अच्छा लगा, क्योंकि उसमें हमारे अपने नहीं थे।

आज के परिप्रेक्ष्य में यह कहना शायद ग़लत होगा कि क्रांति बंदूक की नली से निकलती है। लेकिन यह भी सही है कि समाज में आज भी बहरों की कमी नहीं और उन्हें सुनाने के लिए घमाके ज़रूरी हैं। कई ऐसे आंदोलन हमारे आस-पास शांतिप्रिय ढंग से अपनी गति में चलते दिख रहे हैं, लेकिन उन्हें पोषित करने या उनके साथ खड़े होने की हमने कभी ज़रूरत नहीं समझी। अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे नर्मदा बांध से विस्थापित लोगों को क्या अभी तक सफलता मिल पायी है? इरोम शर्मिला अभी तक अनशन पर बैठी हैं। अपवादों को छोड़ दें, तो मात्र वही व्यक्ति इस आंदोलन में मुखर होता है, जिसका कोई अपना इस तरह की त्रासदी का शिकार बनता है। ऐसे में देश के रणनीतिककारों पर दबाव बने, तो कैसे? हमारी चुप्पी उन्हें कैसे जगा पाएगी?

ऐसे में पास्‍तर नूमोलर की कविता First they came… बरबस याद हो आती है -

वे पहले यहूदियों को मारने आये,
और मैं चुप रहा
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वे साम्यवादियों को मारने आये
मैं फिर भी चुप रहा
क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था
वे श्रमिक संघों को मारने आये
मैं चुप रहा
क्योंकि मैं श्रमिकसंघी नहीं था
फिर वे मुझे मारने आये
और तब मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं रह गया था

क्या हम अभी भी अपनी बेबसी पर रोएंगे या खामोश रहेंगे या फिर मुखर विरोध कर सरकार की क्रूरता पर चीखेंगे? जवाब हमें अपने-आप में टटोलना होगा।

रविवार, 13 सितंबर 2009

आखिर क्यों करे इन बुजुर्गों का सम्मान?

सप्ताह का आखिरी दिन मेरे लिए कुछ खास होता है। इस दिन मेरी छुट्टी होती है और अपने मन-मुताबिक मैं अपनी दिनचर्या तय करता हूं। दिन का ज्यादातर समय अपने इष्ट-मित्र से मिलने में बीतता है और मुमकिन हुआ तो रात भी किसी दोस्त के घर पर ही गुजरती है।

खैर, इस शनिवार भी अपने एक मित्र से मिलने मैं घर से निकल पड़ा। दो दिनों से लगातार बारिश होने से मौसम सुहावना था, इसलिए छुट्टी का भरपुर लुत्फ उठाने के लिए मैं तैयार था। मित्र से मिलने का स्थान गोलचक्कर तय हुआ, इसलिए मैं उधर जा रहे एक ऑटो में सवार हो गया। ऑटो में तीन और सहयात्री मेरे साथ थे। अभी हमने थोड़ी दूरी ही तय की थी कि एक बुर्जुग भी उसी ऑटो में सवार हुए। उनके हाथ में एक बुझी हुई सिगरेट थी। अभी तक सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन चंद मिनटों के बाद ही उन्होंने अपनी बुझी हुई सिगरेट सुलगा ली। चुकि वे किनारे की सीट पर थे, इसलिए उनके सिगरेट से निकल रहा धुंआ मेरी तरफ आ रहा था। मुझे धुओं से एलर्जी है। मैंने उनसे ससस्मान गुजारिश की कि वह सिगरेट बुझा लें, या मेरे उतरने के बाद अपनी तलब पूरी कर लें। मेरे इतना कहते ही वह छुटते हुए बोले, 'कहां जा रहे हो?'

मैंने कहा, 'गोलचक्कर'

'वह तो बहुत दूर है, तो क्या मैं इतनी देर सिगरेट न पीऊं। तेरे को दिक्कत हो रही है, तो उतर जा।'
उनका यह जवाब सुनकर मैं भौंचक रह गया। ऐसी अपेक्षा मैंने नहीं की थी।


यह इस फलसफे का पहला सीन था। मेरा सवाल है कि आखिर हम ऐसे बुजुर्गों की इज्जत क्यों करें? इन्हें हम 'अंकल-अंकल' कहकर क्यों संबोधित करे? लेकिन हम ऐसा करते हैं क्योंकि हमें जन्म के साथ ही यह घुट्टी पिला दी जाती है कि जो भी बुजुर्ग मिलें, उनका आदर करो। लेकिन क्या ऐसे बुजुर्ग आदर के लायक हैं? अगर इनके बेटे और बेटियां सिगरेट या अल्कोहल पीकर घर आती हैं, तो ये हाय-तौबा मचाते हैं। कहते हैं बेटा बिगड़ गया। लेकिन बेटे के बिगड़ऩे की राह किसने तैयार की? क्या इनके बेटे का गुणसूत्र इनसे अलग है। तो आखिर वह क्यों नहीं सिगरेट पीयें या भी कोई अन्य नशा करे? मेरा ख्याल है कि ऐसे ही बुजुर्ग यह कहते हुए पाए जाते हैं कि इनका अपना ही बेगाना हो गया और इन्हें बेआबरु होकर घर से निकाल दिया गया है।


हालांकि मैं बेटे की इस करतूत को सही नहीं ठहरा रहा, लेकिन ऐसे मामलों में हमेशा दोषी औलाद ही क्यों हो? सिक्के का दूसरा पहलू यह भी तो हो सकता है।


ऐसे बुजुर्गों पर आपकी क्या राय है?

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

संपादकगण बेबस करें गुमाश्‍तागीरी...

अभी अभी बीते आम चुनाव में खबरों को जब बाजार की सुनहली पालकी में झुला कर उपभोक्ता के सामने रखा गया, तो खूब हाय-तौबा मची। चारों ओर से यह आवाज उठने लगी कि पत्रकारीय मूल्य में गिरावट आ गयी है और ख़बरों को अर्थ के आधार पर तय किया जाने लगा है। आप कुछ भी छापें हमें फर्क नहीं पड़ता… और खबरों से खेलना ही आपकी पत्रकारिता है… जैसे जुमले प्रयोग होने लगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि ख़बरों को मसाले की छौंक मारकर परोसने का धंधा हाल ही में शुरू हुआ है। बल्कि इस तथाकथित मज़बूत स्तंभ पर आर्थिक या यूं कहे मिलावट की पुताई आज़ादी के बाद से ही शुरु हो गयी थी।

संपादकगण बेबस करें गुमाश्‍तागीरी

यद्यपि पेट भर खाएं न बस फांके पनजीरी

बढ़ा-चढ़ा तो अख़बार का कारोबार है

पांति-पांति में पूंजीवादी प्रचार है

क्या तुमने सोचा था कभी काले-गोरे प्रेसपति

भोले पाठक समुदाय की हर लेंगे गति और मति...

बाबा नागार्जुन ने यह कविता 1950-52 में लिखी थी। इन पंक्तियों को समझने में शायद ही किसी को दिक्कत हो? यहां पूजींवाद और संपादक के बीच पनप रहे नये रिश्ते की तरफ इशारा किया गया है। हां यह बात और है कि अब जाकर भोले-भाले पाठक को यह बात समझ में आयी है। इसलिए बहस का मुद्दा यह नहीं होना चाहिए कि ख़बरों में मिलावट कितनी हो रही है? बल्कि सोचना यह होगा कि आख़‍िर क्यों एक पत्रकार सत्ता की दलाली करने पर मजबूर है?

पिछले महीने ही मेरी एक स्ट्रिंगर से मुलाकात हुई। उसने बताया कि उसे एक ख़बर के लिए महज दस रुपये मिलते हैं। अख़बार में रोज़ाना उसकी दो-तीन ख़बर छपती है। इस तरह देखें तो उसकी मासिक आमदनी करीब हजार-बारह सौ रुपये ही बनती है। ऐसे में आखिर कब तक वह ख़बरों से इंसाफ कर पाएगा? एयरकंडीशन सेमिनारों में हम-आप पत्रकारिता को गांवों से जोड़ने की वक़ालत करते है। चलो गांवों की ओर जैसे नारे बुलंद करते है। लेकिन हममें से कौन गांवों में जाकर आदर्श पत्रकारिता करने को उत्सुक है? जवाब अपवाद में ही होंगे। आज भी गांवों की जो हालत है किसी से छुपी नहीं है। यहां चाय-नाश्‍ते के आधार पर ख़बर गढ़ी जाती है। ऐसे में जब तक स्ट्रिंगर या छोटे पत्रकार को सुविधा नहीं दी जाएगी, तब तक आदर्श पत्रकारिता की बात बेमानी ही साबित होगी। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं लगाना चाहिए कि स्टिंगर ही पत्रकारीय मूल्य में आ रही गिरावट के लिए ज़‍िम्‍मेदार हैं। दरअसल यहां भी पूंजीवादी व्यवस्था का प्रभाव है, और यह सारा खेल मठाधीश बने पत्रकारों का खेला हुआ है, जो अपना लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं।

अपने सौ वर्षों से अधिक का लंबा सफर तय करने के बाद अब तो मीडिया बाकायदा एक उद्योग बन गया है। और हर उद्योग का मक़सद ही होता है, मुनाफा कमाना। मीडियाकर्मी तो मात्र कलम की नौकरी करते हैं और हुक्म की तामील में हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। ऐसे में मीडिया को पत्रकारिता का पर्याय मानना ही मुगालते में रहना होगा। दिनोंदिन मीडिया मैनेजमेंट का दबाव भी इस कदर बढ़ रहा है कि समाचारों की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और तथ्यपरकता की बात बेमानी ही है। ये बात और है कि ख़बर को स्वतंत्र और निष्पक्ष समझने वाले दर्शक-पाठक को धोखा देने के बाद भी हम सिर उठाकर उनकी पत्रकारिता करने का दंभ भरते हैं।

दोस्तो, अब सोचना हम नई पीढ़ी को है। आत्ममंथन करें कि वाकई इस क्षेत्र में हम मिशन प्रधान पत्रकारिता करने आये हैं या उपभोग की संस्कृति का हिस्सा बनने? अगर नयी पौध भी पत्रकारीय मूल्य की तिलांजलि देकर ही पत्रकारिता करती है, तो वह भी उसी भीड़तंत्र का हिस्सा बनेगी, जिसकी नज़र में हाशिये पर खड़े आम आदमी की कोई कीमत नहीं। तब फिर बहस की बात बेमानी होगी?

सोमवार, 6 जुलाई 2009

बच्चा बच्चा हिंदुस्तानी मांग रहा है पानी

उत्तर प्रदेश का नोयडा औद्योगिक शहर के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। तेजी से बढ़ रहे कंक्रीट के जाल इस शहर को नया रूप देने में कोई कोताही नहीं कर रहे। लेकिन मैंने जब इस शहर को नजदीक से देखा, तो मुझे हैरानी हुई कि यहां पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। मीठा पानी खरीद कर यहां के वाशिंदे अपनी प्यास बूझाते हैं। वैसे मीठे जल को लेकर पर्यावरणविदों की चिंताएं यत्र-तत्र-सर्वत्र पढ़ता रहता हूं, लेकिन मैंने इस इलाके में जो देखा वह मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव है।

हाल ही में एक सर्वेक्षण पढ़ा था कि दिल्ली में 25 प्रतिशत लोगों को नहीं मालूम कि यमुना नदी दिल्ली से गुजरती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि यहां के लोगो का सामान्य ज्ञान कमजोर है। बल्कि मेरा मानना है कि लोग अभी भी पानी को लेकर उतने जागरूक नहीं हुए हैं, जितने होने चाहिए। शायद इसलिए अपनी कुल लंबाई (22 किमी.) की मात्र दो प्रतिशत दिल्ली में बहने वाली यमुना में 80 फीसद प्रदूषण यहीं होता है। ''सेंटर फॉर साइंस एंड एंनवायरमेंट'' की सुनीता नारायण भी कहती है कि 'यमुना दिल्ली में दम तोड़ चुकी है, मात्र उसे दफनाया जाना है।' पानी की ठीक यही कहानी देश के बांकी हिस्सों में भी दिख रही है। बाढग़्रस्त इलाके को छोड़ दें तो कमोबेश भारत का सभी हिस्सा पानी के लिए संघर्ष कर रहा है। मध्यप्रदेश में पुलिस की देखरेख में पानी बांटी जा रही है (वह भी राशन कार्ड के आधार पर), दक्षिण के इलाकों में कई लोग पानी बिना काल के गाल में समा चुके हैं और तो और दिल्ली में ही प्रतिदिन 30 करोड़ गैलन पानी की कमी हो रही है।

आखिर ऐसा क्यों ? कौन है इस विकट स्थिति के लिए जिम्मेदार ? क्या नदी घाटी सभ्यता का अंत पानी नहीं मिलने के कारण होगा ? क्या पानी के लिए तीसरे विश्वयुद्घ की आशंका सही साबित होगी ? इन सवालों के जवाब हमें ही ढूढऩें होंगे। यहां मैं आपको रघुवीर सहाय की यह प्रसिद्ध कविता 'पानी' के साथ छोड़ रहा हूं-

पानी पानी
बच्चा बच्चा
हिंदुस्तानी
मांग रहा है पानी

जिसको पानी नहीं मिला है
वह धरती आजाद नहीं
उस पर हिंदुस्तानी बसते हैं
पर वह आबाद नहीं

पानी पानी
बच्चा बच्चा
मांग रहा है हिंदुस्तानी

जो पानी के मालिक हैं
भारत पर उनका कब्जा है
जहां न दे पानी वां सूखा
जहां दें वहां सब्जा है

अपना पानी
मांग रहा है
हिंदुस्तानी

बरसों पानी को तरसाया
जीवन से लाचार किया
बरसों जनता की गंगा पर
तुमने अत्याचार किया

हमको अक्षर नहीं दिया है
हमको पानी नहीं दिया
पानी नहीं दिया तो समझो
हमको बानी नहीं दिया

अपना पानी
अपनी बानी हिंदुस्तानी
बच्चा बच्चा मांग रहा है

धरती के अंदर का पानी
हमको बाहर लाने दो
अपनी धरती अपना पानी
अपनी रोटी खाने दो

पानी पानी पानी पानी
बच्चा बच्चा मांग रहा है
अपनी बानी
पानी पानी पानी पानी
पानी पानी

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

कंधमाल के डंक

चुनाव की सीढ़ीयां चढ़ कर ही लोकतंत्र मजबूत होता है। अगर इस सीढ़ी पर डर के साथ कदम रखा जाए तो शायद स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए चुनाव हो रहे है। 16 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के साथ ही राजनीतिक तापमान भी चढता जा रहा है। लेकिन पहले चरण में एक ऐसे क्षेत्र में भी मतदान हुआ जहां के मतदाता वोट डालने से कतराते रहे।


अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा है कि लोकतंत्र का अर्थ है वह शासन जिसे जनता चुने,जो जनता के लिए हो और जिसे जनता चला रही हो। यानि लोकतंत्र की बुनियाद आम आवाम है,आम आवाज है। लेकिन अगर यह आवाम मतदान से डरने लगे तो क्या हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा? उड़ीसा का कंधमाल भी एक ऐसा ही क्षेत्र है जहां इस बार लोग वोट डालने से कतराते रहे। यह वही कंधमाल है जहां पिछले साल खूनी होली खेली गई थी। यहां एक धर्मगुरू की हत्या हुई और उसके बाद दो समुदाय के बीच दंगा भड़क उठा था। हालात इतने बेकाबू हो गए कि लोगों को घर छोड़कर भागना पड़ा था। हालांकि घर फिर बस गए हैं और जीवन की गाड़ी भी पटरी पर लौट रही है, लेकिन लोग अभी भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वैसे प्रशासन का दावा रहा कि चुनाव में पर्याप्त सुरक्षा दिया गया और शायद इसी दावे का असर रहा कि लोग डरकर ही सही सीमित संख्या में घरों से निकले जरुर।


बहरहाल प्रशासन लोगों में समाए डर को कम करने की कोशिश तो कर रहा है। लेकिन बीते साल का अनुभव कंधमाल की आवाम को अभी भी डरा रहा है। ऐसे में भारत के लोकतंत्र की जीवंतता पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। लोकतंत्र तब तक जीवित है जब तक आवाम का विश्वास चुनाव पर है और वे बेखोफ वोट डालने जा रहे हों।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

जूता बनाम लोकतंत्र

इन दिनों नेताओं और जूतों में एक रिश्ता सा बनता जा रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश पर जूते क्या चले नेताओं को जूते मारने का चलन सा चल पड़ा। चीनी नेता बेन जियाबाओ, गृहमंत्री पी.चिदंबरम,विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी, यहां तक कि अब अभिनेता जीतेन्द्र भी इस जूते चप्पल के खेल से बच नहीं सके। हालात इतने खराब हो गए हैं कि जूते-चप्पलों से बचने के लिए अब नेताओं को नई व्यवस्था करनी पड़ रही है। जिसकी झलक दिखी अहमदाबाद के नरोडा में, जहां भाजपा के स्टार प्रचारक और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता से मुखातिब होने वाले थे। किसी कोने से जूते न उछले इसलिए मंच के आगे भाग को जाल से घेर दिया गया था। अभी तक नरेन्द्र मोदी की तरफ जूते या चप्पल नहीं उछले हैं। लेकिन कहते हैं ना कि दुर्घटना से सुरक्षा भली है-इसलिए यह पूरी कवायद की गई।

खैर, मुद्दा यहां यह नही है कि नेताजी जूते खाने लायक हैं या नहीं। बल्कि हमें यह सोचना चाहिए कि इन घटनाओं से हमारे लोकतंत्र की जीवंतता पर कितना असर पड़ सकता है। ऐसी घटनाओं में हम उस व्यक्ति पर जूते चला रहे होते हैं जिसे हम खुद चुनकर संसद में पहुंचाते हैं। जिसे हम निर्णय लेने वाले हाथ भी कहते हैं। यानि हम अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों का ही जूतों से स्वागत करते हैं।

कहा गया है कि कोई घटना अगर पहली बार हो तो इतिहास बनता है, दो-तीन बार हो तो उसे त्रासदी कहते हैं लेकिन अगर वही घटना बार-बार हो तो वह उपहास का पात्र होता है। कुछ ऐसा ही भारत में भी दिख रहा है। जहां जूता मारना अब सियासी खेल बन चुका है। खबर तो यह भी है कि कानपुर के एक गांव में तो जूते मारने की बकायदा स्कूल खोली गई है। जहां बच्चे और बुजुर्ग नेता के एक पुतले पर जूते-चप्पल मारने का अभ्यास कर रहे हैं। हम यह लगभग भूल चुके हैं कि मुंतजर अल जैदी का विरोध तो एक ऐसे ‘तानाशाह’ के खिलाफ था जिसने इराक को अधोषित उपनिवेश बना रखा है।

इसमें दो राय नहीं कि नेताओं ने देश का बंटाधार किया है। लेकिन इसके लिए मात्र नेता ही दोषी नहीं हैं। कसूर अपने को अच्छे कहने वाले लोगों का भी है,जो राजनीति में आने के बजाय इसे गंदा खेल समझते हैं। नेताओं को जूते मारना ही सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। हमारे पास वोट का भी तो अधिकार है जिसका बेहतर प्रयोग कर हम देश का भला कर सकते हैं। हलांकि ज्यादातर मतदाताओं की यह शिकायत रहती है कि उनके इलाके में कोई ईमानदार उम्मीदवार मैदान में नहीं है। लेकिन हम ईमानदार उम्मीदवार को भी संसद में कहाँ पहुंचाते हैं? नेताओं को जूते मारने से बेहतर है कि हम चुने हुए प्रतिनिधि को ‘वापस बुलाने के अधिकार’ के लिए लड़े। अभी भी जनांदोलन कितना कारगर है इसका बेहतर उदाहरण सूचना का अधिकार आंदोलन से समझा जा सकता है।

कोई भी काम सही रणनीति बनाकर की जाए तभी उसका परिणाम अच्छा होता है। गलत तत्वों वाले नेताओं से मुक्ति पाने के लिए भी हमें उचित तरीका ही अपनाना होगा। महज मीडिया में आने के लिए जूते चलाना उचित नहीं। जूते चलाकर हम मात्र विरोध के इस बढ़िया औजार का उपहास उड़ा रहे हैं। अभी जरुरत है बेहतर रणनीति बनाकर जनांदोलन को आगे बढ़ाया जाए।